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mahabharat 7.175.103: जैसे जल की धाराएँ पर्वत पर गिरती हैं, वैसे ही बाणों से घायल हुआ घटोत्कच पुनः गन्धर्व नगर के समान अदृश्य हो गया ॥103॥   |   mahabharat अध्याय 7.175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 175: घटोत्कच और उसके रथ आदिके स्वरूपका वर्णन तथा कर्ण और घटोत्कचका घोर संग्राम  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  7.175.103 
स हन्यमानो नाराचैर्धाराभिरिव पर्वत:।
गन्धर्वनगराकार: पुनरन्तरधीयत॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
जैसे जल की धाराएँ पर्वत पर गिरती हैं, वैसे ही बाणों से घायल हुआ घटोत्कच पुनः गन्धर्व नगर के समान अदृश्य हो गया ॥103॥
 
Just as streams of water fall on a mountain, Ghatotkacha, struck by the arrows, once again became invisible like the Gandharva city. ॥103॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)