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mahabharat 7.173.33: हे वृष्णिसिंह! जिस प्रकार साँप किसी के पैर का स्पर्श सहन नहीं कर सकता, उसी प्रकार मैं युद्धभूमि में कर्ण को अपनी आँखों के सामने इस प्रकार विचरण करते हुए भी सहन नहीं कर सकूँगा।   |   mahabharat अध्याय 7.173: कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय, युधिष्ठिरकी घबराहट तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनका घटोत्कचको प्रोत्साहन देकर कर्णके साथ युद्धके लिये भेजना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 173: कर्णद्वारा धृष्टद्युम्न एवं पांचालोंकी पराजय, युधिष्ठिरकी घबराहट तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनका घटोत्कचको प्रोत्साहन देकर कर्णके साथ युद्धके लिये भेजना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  7.173.33 
नैनं शक्ष्यामि संसोढुं चरन्तं रणमूर्धनि।
प्रत्यक्षं वृष्णिशार्दूल पादस्पर्शमिवोरग:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे वृष्णिसिंह! जिस प्रकार साँप किसी के पैर का स्पर्श सहन नहीं कर सकता, उसी प्रकार मैं युद्धभूमि में कर्ण को अपनी आँखों के सामने इस प्रकार विचरण करते हुए भी सहन नहीं कर सकूँगा।
 
O Vrishnisingh! Just as a snake cannot bear the touch of anyone's feet, similarly I will not be able to bear Karna moving like this before my eyes at the battle front.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)