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mahabharat 7.170.49-50h: हमारी सेनाएँ बिखरी हुई कहीं भी नहीं रुक पा रही हैं। जैसे वायु एकत्रित बादलों को तितर-बितर कर देती है, वैसे ही अर्जुन का सामना होने पर हमारी सारी सेना अनेक टुकड़ों में बँटकर भागने लगी है। उसकी दशा समुद्र में फटी हुई नाव के समान हो रही है॥49 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.170: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टद्युम्नद्वारा द्रुमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 170: धृष्टद्युम्न और द्रोणाचार्यका युद्ध, धृष्टद्युम्नद्वारा द्रुमसेनका वध, सात्यकि और कर्णका युद्ध, कर्णकी दुर्योधनको सलाह तथा शकुनिका पाण्डव-सेनापर आक्रमण  »  श्लोक 49-50h
 
 
श्लोक  7.170.49-50h 
विप्रकीर्णान्यनेकानि न हि तिष्ठन्ति कर्हिचित्।
वातेनेव समुद्‍धूतमभ्रजालं विदीर्यते॥ ४९॥
सव्यसाचिनमासाद्य भिन्ना नौरिव सागरे।
 
 
अनुवाद
हमारी सेनाएँ बिखरी हुई कहीं भी नहीं रुक पा रही हैं। जैसे वायु एकत्रित बादलों को तितर-बितर कर देती है, वैसे ही अर्जुन का सामना होने पर हमारी सारी सेना अनेक टुकड़ों में बँटकर भागने लगी है। उसकी दशा समुद्र में फटी हुई नाव के समान हो रही है॥49 1/2॥
 
‘Our numerous armies, scattered by them, are unable to stop anywhere. Just as the wind scatters the gathered clouds, similarly, when faced with Arjuna, our entire army has split into many pieces and started running away. Its condition is becoming like a boat torn in the sea.॥ 49 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)