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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 169: नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  7.169.5-6 
रुक्मपुङ्खैरजिह्माग्रै: शरैश्छिन्नतनुच्छदौ।
रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे॥ ५॥
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविव द्रुमौ।
किंशुकाविव चोत्फुल्लो प्रकाशेते रणाजिरे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उन दोनों के कवच स्वर्ण पंख और सीधी नोक वाले बाणों से छिन्न-भिन्न हो गए थे। वे दोनों उस महायुद्ध में रक्त से लथपथ हो गए थे और स्वर्ण के समान विचित्र आभा से चमक रहे थे। वे युद्धभूमि में दो कल्पवृक्षों और दो पुष्पित ढाक वृक्षों के समान चमक रहे थे।
 
The armour of both of them was torn to pieces by arrows with golden feathers and straight tips. Both of them were covered in blood in that great war and were shining with a strange luster like gold. They were shining in the battlefield like two Kalpavrikshas and two blooming Dhaak trees. 5-6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)