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mahabharat 7.169.26-27h: भरतश्रेष्ठ! स्वभाव से ही भयानक दिखने वाला आकाश उस समय और भी अधिक भयानक हो गया। युद्धभूमि में उपस्थित योद्धाओं को वह अन्धकारमय और भयानक रात्रि काली रात्रि के समान प्रतीत हो रही थी। 26 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 7.169: नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 169: नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध  »  श्लोक 26-27h
 
 
श्लोक  7.169.26-27h 
प्रकृत्या घोररूपं तदासीद् घोरतरं पुन:।
रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ योधानां युद्धशालिनाम्॥ २६॥
कालरात्रिनिभा ह्यासीद् घोररूपा भयानका।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! स्वभाव से ही भयानक दिखने वाला आकाश उस समय और भी अधिक भयानक हो गया। युद्धभूमि में उपस्थित योद्धाओं को वह अन्धकारमय और भयानक रात्रि काली रात्रि के समान प्रतीत हो रही थी। 26 1/2॥
 
Bharatshrestha! The sky, which looked terrible by nature, became even more terrible at that time. For the warriors who graced the battlefield, that dark and terrible night seemed like black night. 26 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)