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mahabharat 7.16.d1: उस समय द्रोणाचार्य क्रोध और पराक्रम दोनों से भर गये। उन्होंने धनुष की डोरी पोंछी और तरकश से एक बाण निकाला तथा उस महान बाण और धनुष को हाथ में लेकर सारथि से यह बात कही।   |   mahabharat अध्याय 7.16: वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 16: वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  7.16.d1 
(भारद्वाजममर्षश्च विक्रमश्च समाविशत्।
समुद्‍धृत्य निषङ्गाच्च धनुर्ज्यामवमृज्य च॥
महाशरधनुष्पाणिर्यन्तारमिदमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
उस समय द्रोणाचार्य क्रोध और पराक्रम दोनों से भर गये। उन्होंने धनुष की डोरी पोंछी और तरकश से एक बाण निकाला तथा उस महान बाण और धनुष को हाथ में लेकर सारथि से यह बात कही।
 
At that time Dronacharya was filled with both anger and valour. He wiped the bowstring and took out an arrow from the quiver and holding that great arrow and bow in his hand he said this to the charioteer.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)