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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 16: वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.16.47 
न दिशो नान्तरिक्षं च न द्यौर्नैव च मेदिनी।
अदृश्यन्त महाराज बाणभूता इवाभवन्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
महाराज! न दिशाएँ दिखाई दे रही थीं, न अन्तरिक्ष, न आकाश, न पृथ्वी। सारी दिशाएँ बाणों से भरी हुई थीं।
 
Maharaj! Neither the directions, nor the space, nor the sky, nor the earth could be seen. All the directions were becoming arrow-filled. 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)