अध्याय 16: वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय
श्लोक 1: संजय कहते हैं - महाराज! आपकी विशाल सेना को तितर-बितर होते देख, एकमात्र वीर वृषसेन ने अपने अस्त्रों के जादू से उसे युद्धस्थल में रोक लिया (उसे भागने से रोक दिया)॥1॥
श्लोक 2: उस युद्धभूमि में वृषसेन के छोड़े हुए बाण हाथियों, घोड़ों, रथों और मनुष्यों को छेदते हुए सभी दिशाओं में फैल गए।
श्लोक 3: महाराज! जैसे ग्रीष्म ऋतु में सूर्य से हजारों किरणें निकलकर सब दिशाओं में फैल जाती हैं, उसी प्रकार वृषसेन के धनुष से हजारों तेजस्वी बाण निकलने लगे।
श्लोक 4: राजा! जैसे प्रचण्ड आँधी आने पर बड़े-बड़े वृक्ष सहसा टूटकर गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार वृषसेन से पीड़ित हुए सारथी आदि योद्धा सहसा भूमि पर गिरने लगे॥4॥
श्लोक 5: हे मनुष्यों के स्वामी! उस महाबली योद्धा ने युद्धस्थल में सैकड़ों-हजारों घोड़ों, रथों और हाथियों के समूहों को मार डाला।
श्लोक 6: उसे युद्धभूमि में अकेले निर्भय होकर चलते देख सभी राजा एकत्रित हो गये और उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 7: इस समय नकुल के पुत्र शतानीक ने वृषसेन पर आक्रमण किया और उसे दस भेदी बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 8: तभी कर्ण के पुत्र ने शतानीक का धनुष काट दिया और उसका ध्वज भी गिरा दिया। यह देखकर द्रौपदी के अन्य पुत्र भी अपने भाई की रक्षा के लिए वहाँ पहुँच गए।
श्लोक 9-10: उन्होंने अनायास ही अपने बाणों की वर्षा से कर्णपुत्र वृषसेन को ढककर अदृश्य कर दिया। महाराज! यह देखकर अश्वत्थामा आदि महारथी गर्जना करते हुए उस पर टूट पड़े और जैसे बादल पर्वतों पर जल बरसाते हैं, उसी प्रकार वे नाना प्रकार के बाणों की वर्षा करके द्रौपदी के पुत्रों महारथियों को ढकने लगे॥9-10॥
श्लोक 11: तब पांडवों ने अपने पुत्रों के प्राण बचाने की इच्छा से तुरन्त आकर उन कौरव योद्धाओं को रोक दिया। पांडवों के साथ पांचाल, केकय, मत्स्य और संजय देशों के योद्धा भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित उपस्थित थे।
श्लोक 12: हे राजन! तत्पश्चात् पाण्डवों और आपके सैनिकों के बीच देवताओं और दानवों के समान अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो इतना भयानक था कि रीढ़ की हड्डी में सिहरन दौड़ जाती थी।
श्लोक 13: इस प्रकार एक दूसरे के प्रति अपराध करनेवाले कौरव और पाण्डव एक दूसरे की ओर क्रोध भरी दृष्टि से देखते हुए युद्ध करने लगे॥13॥
श्लोक 14: क्रोध में युद्ध करते हुए उन महाप्रतापी राजाओं के शरीर युद्ध की इच्छा से आकाश में इकट्ठे हुए पक्षीराज गरुड़ और सर्पों के समान प्रतीत हो रहे थे ॥14॥
श्लोक 15: भीम, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोण, अश्वत्थामा, धृष्टद्युम्न और सात्यकि जैसे वीर योद्धाओं की उपस्थिति से वह युद्धस्थल ऐसा सुन्दर प्रतीत हो रहा था मानो प्रलयकाल का सूर्य वहाँ उदय हुआ हो।
श्लोक 16: उस समय उन महाबली योद्धाओं में परस्पर आक्रमण करते हुए भयंकर युद्ध हो रहा था, जैसे प्राचीन काल में महाबली दैत्यों ने महाबली देवताओं के साथ युद्ध किया था॥16॥
श्लोक 17: तत्पश्चात् युधिष्ठिर की सेना अपनी प्रचण्ड लहरों से समुद्र के समान गर्जना करती हुई आपकी सेना का विनाश करने लगी। इससे कौरव सेना के महारथी भाग गए॥17॥
श्लोक 18: शत्रुओं द्वारा बुरी तरह कुचली हुई आपकी सेना को भागते हुए देखकर द्रोणाचार्य ने कहा, "वीर योद्धाओं! भागो मत, इससे कोई लाभ नहीं होगा।" ॥18॥
श्लोक d1: उस समय द्रोणाचार्य क्रोध और पराक्रम दोनों से भर गये। उन्होंने धनुष की डोरी पोंछी और तरकश से एक बाण निकाला तथा उस महान बाण और धनुष को हाथ में लेकर सारथि से यह बात कही।
श्लोक d2: द्रोणाचार्य ने कहा, "सारथी! उस स्थान पर जाओ जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर सुन्दर श्वेत छत्र लिए खड़े हैं।"
श्लोक d3: धृतराष्ट्र की यह सेना अनेक भागों में विभक्त होकर बिखर रही है। मैं युधिष्ठिर को रोककर इस सेना को स्थिर करूँगा (इसे भागने से रोकूँगा)।
श्लोक d4: तात! ये पाण्डव, मत्स्य, पांचाल और समस्त सोमक योद्धा मुझ पर बाण नहीं बरसा सकते।
श्लोक d5: अर्जुन ने भी मेरी कृपा से महान् अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए हैं। हे प्रिये! भीमसेन और सात्यकि भी मुझसे युद्ध करने का साहस नहीं कर सकते।
श्लोक d6: मेरे आशीर्वाद से अर्जुन महान धनुर्धर बन गया है। धृष्टद्युम्न को भी मेरे द्वारा दिए गए अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान है।
श्लोक d7: हे सारथि! यह समय विजय की आकांक्षा रखने वाले वीर पुरुष के लिए प्राण बचाने का नहीं है। तुम्हें स्वर्ग प्राप्ति, यश और विजय का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
श्लोक d8-d9: संजय कहते हैं - हे राजन! इस प्रकार प्रेरित होकर सारथि अश्वहृदय नामक मन्त्र का जप करता हुआ तथा घोड़ों का हर्ष बढ़ाता हुआ शीघ्रतापूर्वक आच्छादित, उज्ज्वल तथा कान्तियुक्त रथ पर सवार होकर द्रोणाचार्य को आगे ले गया।
श्लोक d10: उस समय करुष, मत्स्य, चेदि, सात्वत, पांडव और पांचाल वीरों ने एकत्रित होकर द्रोणाचार्य को रोका।
श्लोक 19: तब लाल घोड़ों पर सवार द्रोणाचार्य क्रोधित होकर चार दाँत वाले हाथी की तरह पाण्डव सेना में घुस आये और युधिष्ठिर पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 20: युधिष्ठिर ने गिद्ध के पंख लगे तीखे बाणों से द्रोणाचार्य को घायल कर दिया। तब द्रोणाचार्य ने उनका धनुष काटकर उन पर बड़े जोर से प्रहार किया।
श्लोक 21: उस समय युधिष्ठिर के रथ के पहिये की रक्षा करने वाले कुमार (जो पांचालों की कीर्ति बढ़ाने वाले हैं) ने आते हुए द्रोणाचार्य को उसी प्रकार रोक दिया, जैसे किनारा समुद्र को रोक देता है।
श्लोक 22: जब पाण्डव सेना ने देखा कि महाब्राह्मण द्रोणाचार्य कुमार द्वारा रोके जा रहे हैं, तब सिंहों की गर्जना जोर से हुई और सब लोग 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहने लगे॥ 22॥
श्लोक 23: उस महायुद्ध में कुमार क्रोधित हो गए और बार-बार गर्जना करते हुए उन्होंने द्रोणाचार्य की छाती में बाण मारा।
श्लोक 24: इसके अतिरिक्त उस महाबली कुमार ने हजारों बाणों द्वारा द्रोणाचार्य को युद्धभूमि में रोक दिया; क्योंकि उसके हाथ शस्त्र चलाने में निपुण थे और उसने कठिन परिश्रम पर विजय प्राप्त कर ली थी॥ 24॥
श्लोक 25: परंतु योद्धाओं में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य ने चक्ररक्षक कुमार को, जिसने वीरता, आर्यव्रती और मन्त्र-विद्या का अभ्यास किया था, पराजित कर दिया ॥25॥
श्लोक 26: राजन! भारद्वाजनंदन विप्रवर द्रोणाचार्य आपकी सेना के रक्षक थे। वे पाण्डव सेना के मध्य में घुसकर सब दिशाओं में विचरण करने लगे॥26॥
श्लोक 27-28: उसने शिखण्डी को बारह बाणों से, उत्तमौजा को बीस बाणों से, नकुल को पाँच बाणों से और सहदेव को सात बाणों से घायल कर दिया; तत्पश्चात् उसने युधिष्ठिर को बारह बाणों से, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को तीन-तीन बाणों से, सात्यकि को पाँच बाणों से और विराट को दस बाणों से घायल कर दिया॥27-28॥
श्लोक 29: हे राजन! उसने युद्धस्थल में प्रधान योद्धाओं पर आक्रमण करके सबको आतंकित कर दिया और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए उन पर बड़े बल से आक्रमण किया।
श्लोक 30: उस समय राजा युगंधर ने समुद्र के समान क्रोध से भरे हुए तथा वायु के झोंकों से व्याकुल हो रहे महारथी द्रोणाचार्य को रोक लिया।
श्लोक 31: तत्पश्चात्, मुड़े हुए बाणों से युधिष्ठिर को घायल करके द्रोणाचार्य ने भल्ल नामक बाण से युगंधर को मारकर उसे रथ के आसन से नीचे गिरा दिया।
श्लोक 32-33: यह देखकर राजा युधिष्ठिर की रक्षा के लिए विराट, द्रुपद, केकय, सात्यकि, शिबि, पांचाल के व्याघ्रदत्त और शूरवीर सिंहसेना के साथ-साथ कई अन्य राजा द्रोणाचार्य के रास्ते में खड़े हो गए और उन पर बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 34: महाराज! पांचालदेशी बाघ दत्त ने पचास तीखे बाणों से द्रोणाचार्य को घायल कर दिया। तब सब लोग जोर-जोर से जयजयकार करने लगे।
श्लोक 35: सिंहसेन ने हर्ष से भरकर तुरन्त ही महाबली द्रोणाचार्य को घायल कर दिया और अचानक जोर से हंसने लगा, जिससे अन्य महाबली योद्धाओं के हृदय में भय उत्पन्न हो गया।
श्लोक 36: तब द्रोणाचार्य ने आँखें फाड़कर देखकर अपने धनुष की डोरी निकाली और जोर से गर्जना करते हुए राजाओं की सेना पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 37: तत्पश्चात् पराक्रमी द्रोण ने अपने आक्रमण से भल्ल नामक दो बाणों से सिंहसेन और व्याघ्रदत्त के कुंडलित सिरों को धड़ से अलग कर दिया ॥37॥
श्लोक 38: इसके बाद वे पाण्डवों के अन्य महारथियों को अपने बाणों से मथकर संहारकारी यमराज के समान युधिष्ठिर के रथ के पास खड़े हो गये।
श्लोक 39: राजन! नियम-कायदों का पालन करने वाले द्रोणाचार्य युधिष्ठिर के बहुत निकट आ पहुँचे। तब उनकी सेना के सैनिकों में बड़ा कोलाहल मच गया। सब लोग कहने लगे, 'हाय! राजा मारा गया।' 39.
श्लोक 40: वहाँ द्रोणाचार्य का पराक्रम देखकर कौरव सैनिकों ने कहा, ‘आज राजा दुर्योधन की इच्छा अवश्य पूरी होगी।’ 40.
श्लोक 41: इस शुभ घड़ी में द्रोणाचार्य अवश्य ही युद्धभूमि में राजा युधिष्ठिर को पकड़कर बड़े हर्ष के साथ हमारे राजा दुर्योधन के पास ले आएंगे।'
श्लोक 42: राजन! जब आपके सैनिक ये बातें कह रहे थे, उसी समय महारथी कुन्तीपुत्र अर्जुन बड़े वेग से उनके सामने आये, उनके रथ की घड़घड़ाहट से सारी दिशाएँ गूंज उठीं।
श्लोक 43-45h: वे उस भीषण युद्ध में रक्त की एक नदी बहाकर लाए थे। उसका जल रक्त से भरा हुआ था। रथ भँवरों में डगमगा रहा था। योद्धाओं की हड्डियाँ उसमें शिलाओं की भाँति बिखरी हुई थीं। भूत-प्रेतों के कंकाल नदी के किनारे प्रतीत हो रहे थे, जिन्हें वह अपने वेग से तोड़कर बहा ले जा रही थी। बाणों के समूह उसमें झाग के विशाल ढेर के समान प्रतीत हो रहे थे। भाले आदि अस्त्र-शस्त्र उसमें मछलियों की भाँति फैले हुए थे। उस नदी को शीघ्रता से पार करके कौरव सैनिकों को भगाते हुए, पाण्डवपुत्र किरीटधारी अर्जुन ने अचानक द्रोणाचार्य की सेना पर आक्रमण कर दिया।
श्लोक 45-46: वह द्रोणाचार्य को अपने बाणों की बड़ी संख्या से घेरने लगा, मानो कोई जादू कर रहा हो। कुंतीपुत्र अर्जुन धनुष पर बाण चढ़ाकर इतनी तेज़ी से छोड़ रहा था कि कोई भी दोनों क्रियाओं में अंतर नहीं देख पा रहा था।
श्लोक 47: महाराज! न दिशाएँ दिखाई दे रही थीं, न अन्तरिक्ष, न आकाश, न पृथ्वी। सारी दिशाएँ बाणों से भरी हुई थीं।
श्लोक 48: राजन! उस युद्धस्थल में गाण्डीवधारी अर्जुन ने अपने बाणों से महान अंधकार फैला दिया था। उसमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
श्लोक 49: सूर्य पश्चिम की ओर चला गया और सारा जगत अंधकार में डूब गया। उस समय न तो मित्र का पता चलता था और न ही शत्रु का ॥49॥
श्लोक 50-51h: तब द्रोणाचार्य और दुर्योधन आदि ने अपनी सेना वापस ले ली। यह जानकर कि शत्रुओं की अब युद्ध में रुचि समाप्त हो गई है और वे अत्यन्त भयभीत हैं, अर्जुन ने भी धीरे-धीरे अपनी सेना को युद्धभूमि से हटा लिया।
श्लोक 51-52h: उस समय पाण्डव हर्ष में भरकर सुन्दर शब्दों में कुन्तीपुत्र अर्जुन की स्तुति करने लगे, जैसे संजय ऋषि और वीर पांचाल सूर्यदेव की स्तुति करते हैं।
श्लोक 52-53: इस प्रकार समस्त शत्रुओं को जीतकर अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ समस्त सेनाओं को छोड़कर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक अपने शिविर में चले गए ॥52-53॥
श्लोक 54: जैसे आकाश में चन्द्रमा तारों से युक्त होकर सुशोभित होता है, उसी प्रकार पाण्डु नन्दन अर्जुन इन्द्रजनित, पद्मराग, स्वर्ण, वज्रमणि, मूंगा और स्फटिक आदि बहुमूल्य रत्नों से विभूषित विचित्र रथ पर बैठे हुए शोभायमान हो रहे थे॥54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥