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mahabharat 7.158.64: मैं महाबली से महाबली की विजय को भी भाग्य के अधीन मानता हूँ। भाग्य के अधीन होने के कारण ही महाबली भीष्म आज सैकड़ों बाणों से बिंधकर युद्धभूमि में पड़े हैं॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 7.158: दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 158: दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  7.158.64 
दैवायत्तमहं मन्ये जयं सुबलिनामपि।
यत्र भीष्मो महाबाहु: शेते शरशताचित:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
मैं महाबली से महाबली की विजय को भी भाग्य के अधीन मानता हूँ। भाग्य के अधीन होने के कारण ही महाबली भीष्म आज सैकड़ों बाणों से बिंधकर युद्धभूमि में पड़े हैं॥ 64॥
 
‘I consider the victory of even the strongest of the mighty to be dependent on destiny. Being dependent on destiny, the mighty Bhishma today lies on the battlefield after being pierced by hundreds of arrows.॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)