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mahabharat 7.158.33-34: कृपाचार्य बोले - सूतपुत्र ! मेरे मन को बाँधने के लिए तुम्हारी ये व्यर्थ की बकवास मेरे लिए विश्वास करने योग्य नहीं है। कान! तुम सदैव श्रीकृष्ण, अर्जुन और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर पर आक्रमण करते हो; किन्तु विजय उसी पक्ष की होगी, जहाँ योद्धा श्रीकृष्ण और अर्जुन उपस्थित हों ॥33-34॥   |   mahabharat अध्याय 7.158: दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 158: दुर्योधन और कर्णकी बातचीत, कृपाचार्यद्वारा कर्णको फटकारना तथा कर्णद्वारा कृपाचार्यका अपमान  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  7.158.33-34 
कृप उवाच
मनोरथप्रलापा मे न ग्राह्यास्तव सूतज॥ ३३॥
सदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम्।
ध्रुवस्तत्र जय: कर्ण यत्र युद्धविशारदौ॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
कृपाचार्य बोले - सूतपुत्र ! मेरे मन को बाँधने के लिए तुम्हारी ये व्यर्थ की बकवास मेरे लिए विश्वास करने योग्य नहीं है। कान! तुम सदैव श्रीकृष्ण, अर्जुन और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर पर आक्रमण करते हो; किन्तु विजय उसी पक्ष की होगी, जहाँ योद्धा श्रीकृष्ण और अर्जुन उपस्थित हों ॥33-34॥
 
Kripacharya said – Son of Suta! These meaningless blabberings of yours to bind my intentions are not worthy of belief for me. Ear! You always attack Shri Krishna, Arjun and Pandu's son Yudhishthir; But victory will be of that side, where the warriors Shri Krishna and Arjun are present. 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)