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mahabharat 7.156.3: सत्यके! क्षत्रिय धर्म में तत्पर विद्वान पुरुष युद्ध से विमुख तथा युद्धस्थल में निराश होकर शरणागत हुए पुरुष पर आक्रमण कैसे कर सकता है?॥3॥   |   mahabharat अध्याय 7.156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.156.3 
पराङ्मुखाय दीनाय न्यस्तशस्त्राय सात्यके।
क्षत्रधर्मरत: प्राज्ञ: कथं नु प्रहरेद् रणे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सत्यके! क्षत्रिय धर्म में तत्पर विद्वान पुरुष युद्ध से विमुख तथा युद्धस्थल में निराश होकर शरणागत हुए पुरुष पर आक्रमण कैसे कर सकता है?॥3॥
 
Satyake! How can a learned man devoted to the kshatriya dharma attack a person who has turned away from the war and has surrendered in despair on the battlefield?॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)