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mahabharat 7.156.162: धृष्टद्युम्न ने बिना किसी भय के द्रोणपुत्र के वृक्ष पर विषैले सर्पों के समान स्वर्ण पंख वाले अनेक बाण छोड़े।   |   mahabharat अध्याय 7.156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  7.156.162 
धृष्टद्युम्नस्त्वसम्भ्रान्तो मुमोचाशीविषोपमान्।
सुवर्णपुङ्खान् विशिखान् द्रोणपुत्रस्य वक्षसि॥ १६२॥
 
 
अनुवाद
धृष्टद्युम्न ने बिना किसी भय के द्रोणपुत्र के वृक्ष पर विषैले सर्पों के समान स्वर्ण पंख वाले अनेक बाण छोड़े।
 
Dhrishtadyumna, without any fear, shot many arrows having golden feathers, like poisonous serpents, at the tree of Drona's son.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)