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mahabharat 7.156.13: मैं सदैव क्षत्रिय के आचरण में स्थित हूँ। युद्ध ही मेरा सार है और दुष्ट लोग ही मेरा आदर करते हैं। ऐसे कठोर वचनों से तुम मुझे भयभीत नहीं कर सकते॥13॥   |   mahabharat अध्याय 7.156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 156: सोमदत्त और सात्यकिका युद्ध, सोमदत्तकी पराजय, घटोत्कच और अश्वत्थामाका युद्ध और अश्वत्थामाद्वारा घटोत्कचके पुत्रका, एक अक्षौहिणी राक्षस-सेनाका तथा द्रुपदपुत्रोंका वध एवं पाण्डव-सेनाकी पराजय  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  7.156.13 
युद्धसारेण वाक्येन असतां सम्मतेन च।
नाहं भीषयितुं शक्य: क्षत्रवृत्ते स्थितस्त्वया॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मैं सदैव क्षत्रिय के आचरण में स्थित हूँ। युद्ध ही मेरा सार है और दुष्ट लोग ही मेरा आदर करते हैं। ऐसे कठोर वचनों से तुम मुझे भयभीत नहीं कर सकते॥13॥
 
‘I am always established in the conduct of a Kshatriya. Whose essence is war and whom only evil men respect; you cannot frighten me with such harsh words.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)