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mahabharat 7.154.26-27h: महाराज! उस अन्धकारमय प्रदेश में मित्र और शत्रु में भेद नहीं किया जा सकता था। उस भोर में सब कुछ उन्माद में था। 26 1/2।   |   mahabharat अध्याय 7.154: रात्रियुद्धमें पाण्डव-सैनिकोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण और द्रोणाचार्यद्वारा उनका संहार   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  7.154.26-27h 
नैव स्वे न परे राजन् प्राज्ञायन्त तमोवृते॥ २६॥
उन्मत्तमिव तत् सर्वं बभूव रजनीमुखे।
 
 
अनुवाद
महाराज! उस अन्धकारमय प्रदेश में मित्र और शत्रु में भेद नहीं किया जा सकता था। उस भोर में सब कुछ उन्माद में था। 26 1/2।
 
King! In that dark region one could not distinguish between friend and foe. In that dawn everything seemed to be in a frenzy. 26 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)