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mahabharat 7.150.26-27: हे गुरुदेव, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ! आज मैं आपके समक्ष अपने यज्ञ, यज्ञ, कुएँ, बावड़ी आदि के निर्माण, अपने पराक्रम और अपने पुत्रों के शुभ कर्मों की शपथ लेता हूँ कि अब मैं युद्ध में पाण्डवों सहित समस्त पांचालों का वध करके ही शांति प्राप्त करूँगा अथवा युद्ध में मरकर मैं भी उन लोकों में चला जाऊँगा जहाँ मेरे मित्र चले गए हैं॥26-27॥   |   mahabharat अध्याय 7.150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  7.150.26-27 
सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वशस्त्रभृतां वर।
इष्टापूर्तेन च शपे वीर्येण च सुतैरपि॥ २६॥
निहत्य तान् रणे सर्वान् पञ्चालान् पाण्डवै: सह।
शान्तिं लब्धास्मि तेषां वा रणे गन्ता सलोकताम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे गुरुदेव, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ! आज मैं आपके समक्ष अपने यज्ञ, यज्ञ, कुएँ, बावड़ी आदि के निर्माण, अपने पराक्रम और अपने पुत्रों के शुभ कर्मों की शपथ लेता हूँ कि अब मैं युद्ध में पाण्डवों सहित समस्त पांचालों का वध करके ही शांति प्राप्त करूँगा अथवा युद्ध में मरकर मैं भी उन लोकों में चला जाऊँगा जहाँ मेरे मित्र चले गए हैं॥26-27॥
 
Gurudev is the best among all the weapon wielders! Today, I take an oath in front of you on the auspicious deeds of my Yagya, Yagya, construction of well, stepwell, etc., my bravery and my sons, that now I will attain peace only by killing all the Panchalas along with the Pandavas in the war or I will also go to the worlds where my friends have gone after dying in the war. 26-27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)