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mahabharat 7.150.24-25: शत्रुओं को संताप देने वाले आचार्य! आज मैं उन सभी वीरों को यमुना का जल अर्पण करूँगा, जो युद्ध से कभी नहीं घबराए और जो मेरे लिए लड़ते हुए तथा मेरे शत्रुओं को परास्त करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाकर, उनका ऋण चुकाने के लिए मर गए। 24-25॥   |   mahabharat अध्याय 7.150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  7.150.24-25 
व्यायच्छन्तो हता: शूरा मदर्थे येऽपराङ्मुखा:।
यतमाना: परं शक्त्या विजेतुमहितान् मम॥ २४॥
तेषां गत्वाहमानृण्यमद्य शक्त्या परंतप।
तर्पयिष्यामि तानेव जलेन यमुनामनु॥ २५॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं को संताप देने वाले आचार्य! आज मैं उन सभी वीरों को यमुना का जल अर्पण करूँगा, जो युद्ध से कभी नहीं घबराए और जो मेरे लिए लड़ते हुए तथा मेरे शत्रुओं को परास्त करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगाकर, उनका ऋण चुकाने के लिए मर गए। 24-25॥
 
Acharya who torments the enemies! Today, I will offer the water of Yamuna to all those brave souls who never shied away from the war and who died fighting for me and trying their best to defeat my enemies, to the best of my ability, to repay their debt. 24-25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)