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mahabharat 7.150.2: वह दुष्ट सर्प जिसके दाँत टूट गए हों, के समान हृदय में दुःखी होकर आहें भरने लगा। सम्पूर्ण जगत् के प्रति अपराध करने वाले आपके पुत्र को महान् दुःख हुआ॥2॥   |   mahabharat अध्याय 7.150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.150.2 
दुर्मना नि:श्वसन् दुष्टो भग्नदंष्ट्र इवोरग:।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रस्तेऽऽर्तिं परामगात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
वह दुष्ट सर्प जिसके दाँत टूट गए हों, के समान हृदय में दुःखी होकर आहें भरने लगा। सम्पूर्ण जगत् के प्रति अपराध करने वाले आपके पुत्र को महान् दुःख हुआ॥2॥
 
Like a wicked snake whose teeth have been broken, he became sad in his heart and started sighing. Your son, who had committed a crime against the entire world, felt great pain.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)