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mahabharat 7.150.18: हाय! मेरे जो मित्र मुझ लोभी, पापी, धर्म का नाश करने वाले, युद्ध में विजय पाना चाहते थे, वे यमलोक चले गए॥18॥   |   mahabharat अध्याय 7.150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 150: व्याकुल हुए दुर्योधनका खेद प्रकट करते हुए द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  7.150.18 
मम लुब्धस्य पापस्य तथा धर्मापचायिन:।
व्यायामेन जिगीषन्त: प्राप्ता वैवस्वतक्षयम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हाय! मेरे जो मित्र मुझ लोभी, पापी, धर्म का नाश करने वाले, युद्ध में विजय पाना चाहते थे, वे यमलोक चले गए॥18॥
 
Alas! My friends who wanted to win a war for me, a greedy and sinner who destroys religion, have gone to Yamaloka. ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)