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mahabharat 7.147.6: वे युद्धभूमि में गुरु और गुरुपुत्र का वध नहीं करना चाहते थे, इसलिए कुन्तीपुत्र धनंजय ने वहाँ अपने गुरु का सम्मान किया ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 7.147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.147.6 
सोऽजिघांसुर्गुरुं संख्ये गुरोस्तनयमेव च।
चकाराचार्यकं तत्र कुन्तीपुत्रो धनंजय:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वे युद्धभूमि में गुरु और गुरुपुत्र का वध नहीं करना चाहते थे, इसलिए कुन्तीपुत्र धनंजय ने वहाँ अपने गुरु का सम्मान किया ॥6॥
 
They did not want to kill the Guru and the Guru's son in the battlefield. Therefore, Kunti's son Dhananjay honored his teacher there. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)