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mahabharat 7.147.50-51h: महाराज! उस युद्धस्थल में अत्यन्त क्रोध में भरे हुए कर्ण ने भी अपनी मर्यादा से विचलित न होने वाले सात्यकि पर बाणों की वर्षा करके आक्रमण किया।   |   mahabharat अध्याय 7.147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 147: अर्जुनके बाणोंसे कृपाचार्यका मूर्च्छित होना, अर्जुनका खेद तथा कर्ण और सात्यकिका युद्ध एवं कर्णकी पराजय  »  श्लोक 50-51h
 
 
श्लोक  7.147.50-51h 
राधेयोऽपि महाराज शरवर्षं समुत्सृजन्॥ ५०॥
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धो रणे शैनेयमच्युतम्।
 
 
अनुवाद
महाराज! उस युद्धस्थल में अत्यन्त क्रोध में भरे हुए कर्ण ने भी अपनी मर्यादा से विचलित न होने वाले सात्यकि पर बाणों की वर्षा करके आक्रमण किया।
 
Maharaj! Karna, filled with great anger, also attacked Satyaki, who was not deviating from his decorum, showering arrows on him on that battlefield. 50 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)