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श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 146: अर्जुनका अद्भुत पराक्रम और सिन्धुराज जयद्रथका वध  »  श्लोक 87-89h
 
 
श्लोक  7.146.87-89h 
तस्मिन् महाभीषणके प्रजानामिव संक्षये।
रणे महति दुष्पारे वर्तमाने सुदारुणे॥ ८७॥
शोणितस्य प्रसेकेन शीघ्रत्वादनिलस्य च।
अशाम्यत् तद् रजो भौममसृक्सिक्ते धरातले॥ ८८॥
आनाभि निरमज्जंश्च रथचक्राणि शोणिते।
 
 
अनुवाद
जब वह महान, भयानक, भयंकर और दीर्घकालीन युद्ध चल रहा था, मानो समस्त प्राणियों का विनाश काल हो रहा हो, तब रक्त की वर्षा और वायु के वेग से बहने वाले वेग से पृथ्वी की रक्त से सनी धूल शांत हो गई। रथ के पहिए पूर्णतः रक्त में डूब गए।
 
When that great, dreadful, fierce and long battle was going on, like the time of destruction of all living beings, the rain of blood and the rapid blowing of the wind pacified the blood-soaked dust of the ground. The wheels of the chariot were completely immersed in blood. 87-88 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)