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mahabharat 7.146.65: हे प्रभु! वह दुष्ट मनुष्य सुखपूर्वक अपने प्राणों की इच्छा रखता हुआ तथा आपके विनाश की इच्छा रखता हुआ, किसी भी प्रकार से अपने को छिपा न सकेगा।   |   mahabharat अध्याय 7.146: अर्जुनका अद्भुत पराक्रम और सिन्धुराज जयद्रथका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 146: अर्जुनका अद्भुत पराक्रम और सिन्धुराज जयद्रथका वध  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.146.65 
हर्षेण जीविताकाङ्क्षी विनाशार्थं तव प्रभो।
न गोप्स्यति दुराचार: स आत्मानं कथंचन॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! वह दुष्ट मनुष्य सुखपूर्वक अपने प्राणों की इच्छा रखता हुआ तथा आपके विनाश की इच्छा रखता हुआ, किसी भी प्रकार से अपने को छिपा न सकेगा।
 
Lord! That wicked person, happily desiring his life and eager for your destruction, will not be able to keep himself hidden in any way. 65.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)