एतत् ते सर्वमाख्यातं यत्र ते संशय: प्रभो।
कुरुराज नरश्रेष्ठ तव व्यपनयो महान्॥ २९॥
अनुवाद
हे प्रभु! जिस-जिस विषय में तुम्हें संदेह था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बता दिया है। हे कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारा यह घोर अन्याय ही इस युद्ध का कारण है।
Lord! I have explained everything you had doubts about in detail. O best of the Kuru kings! Your great injustice is the reason for starting this war.
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रशंसायां चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका प्रशंसाविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४४॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/२ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)