श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 144: सात्यकिके भूरिश्रवाद्वारा अपमानित होनेका कारण तथा वृष्णिवंशी वीरोंकी प्रशंसा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  7.144.27 
समर्थान् नावमन्यन्ते दीनानभ्युद्धरन्ति च।
नित्यं देवपरा दान्तास्त्रातारश्चाविकत्थना:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वह कभी बलवानों का तिरस्कार नहीं करता और दीन-दुखियों का उद्धार करता है। वह सदैव भगवान का भक्त, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाला, दूसरों का रक्षक और आत्म-प्रशंसा से दूर रहने वाला होता है।॥27॥
 
He never disregards the powerful and saves the poor and the suffering. He is always a devotee of God, has controlled his senses, is a protector of others and stays away from self-praise.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)