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mahabharat 7.143.32: तुम्हें अपनी निन्दा करनी चाहिए, क्योंकि तुम अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते। हे वीर! फिर जो तुम्हारी शरण में आता है, उसकी रक्षा कैसे करोगे?॥ 32॥   |   mahabharat अध्याय 7.143: भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 143: भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.143.32 
त्वं वै विगर्हयात्मानमात्मानं यो न रक्षसि।
कथं करिष्यसे वीर यो वा त्वां संश्रयेज्जन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें अपनी निन्दा करनी चाहिए, क्योंकि तुम अपनी रक्षा भी नहीं कर सकते। हे वीर! फिर जो तुम्हारी शरण में आता है, उसकी रक्षा कैसे करोगे?॥ 32॥
 
You should criticize yourself because you cannot even protect yourself. O brave one! Then how will you protect the one who comes under your protection?॥ 32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)