श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.142.65 
असत्यो विक्रम: पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे।
विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! वीरता तो मिथ्या है, उसका आश्रय लेकर भी वृष्णिवंशी सत्य और वीर सत्य ने युद्धभूमि में अपनी सम्भावनाएँ बढ़ा ली हैं॥65॥
 
Parth! Valor is a lie, even after taking shelter of it, the true and brave Satya of Vrishni have increased their chances in the battlefield. 65॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas