श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  7.142.55 
न वशं यज्ञशीलस्य गच्छेदेष वरोऽर्जुन।
त्वत्कृते पुरुषव्याघ्र तदाशु क्रियतां विभो॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषसिंह अर्जुन! हे प्रभु! शीघ्र ही प्रयत्न करो कि यह महाबली तुम्हारे लिए बलि भूरिश्रवा के अधीन न हो जाये ॥55॥
 
Purush Singh Arjun! Lord! Make efforts quickly so that this great hero does not become subservient to the sacrificial Bhurishrava for you. 55॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas