श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  7.142.50 
परिश्रान्तं युधां श्रेष्ठं सम्प्राप्तो भूरिदक्षिण:।
युद्धाकाङ्क्षी समायान्तं नैतत् सममिवार्जुन॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन! योद्धाओं में श्रेष्ठ सात्यकि यहाँ आ रहे हैं और बहुत थके हुए हैं। फिर भी यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले भूरिश्रवा उनसे युद्ध करने की इच्छा से यहाँ आये हैं। यह युद्ध समान योग्यता का नहीं है।॥50॥
 
Arjuna! Satyaki, the best of warriors, is coming here and is very tired. Yet Bhurishrava, who gives ample dakshina in sacrifices, has come here with the desire to fight with him. This battle is not of equal ability.'॥ 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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