श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  7.142.34-35 
चरन्तौ विविधान् मार्गान् मण्डलानि च भागश:॥ ३४॥
मुहुराजघ्नतु: क्रुद्धावन्योन्यमरिमर्दनौ।
सखड्गौ चित्रवर्माणौ सनिष्काङ्गदभूषणौ॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वे दोनों वीर योद्धा क्रोध में भरकर नाना प्रकार की युक्तियों और चालों का प्रयोग करते हुए एक-दूसरे पर बार-बार आक्रमण करने लगे। उनके हाथों में तलवारें चमक रही थीं। उन दोनों के कवच अद्वितीय थे और वे निष्क तथा अंगद के समान आभूषणों से विभूषित थे। 34-35।
 
Both those brave warriors, filled with anger, started attacking each other repeatedly, using different types of tactics and moves. Swords were shining in their hands. Both of them had unique armours and were adorned with ornaments like Nishka and Angad. 34-35.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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