श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 142: भूरिश्रवा और सात्यकिका रोषपूर्वक सम्भाषण और युद्ध तथा सात्यकिका सिर काटनेके लिये उद्यत हुए भूरिश्रवाकी भुजाका अर्जुनद्वारा उच्छेद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.142.17 
शारदस्येव मेघस्य गर्जितं निष्फलं हि ते।
श्रुत्वा त्वद्‍गर्जितं वीर हास्यं हि मम जायते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
शरद ऋतु के बादलों की तरह तुम्हारा गरजना व्यर्थ है। हे वीर! मैं तुम्हारी गरज पर हँसता हूँ।'
 
‘Your roaring like the clouds of autumn is of no avail. O brave one! I laugh at your roaring.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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