श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 141: सात्यकिका अद्भुत पराक्रम, श्रीकृष्णका अर्जुनको सात्यकिके आगमनकी सूचना देना और अर्जुनकी चिन्ता  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  7.141.6-7 
प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्यामि लाघवात्॥ ६॥
उदीचीं दक्षिणां प्राचीं प्रतीचीं विदिशस्तथा।
नृत्यन्निवाचरच्छूरो यथा रथशतं तथा॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वह इतनी वेग से चल रहा था कि पश्चिम में उसे देखकर मैं तुरन्त ही पूर्व में भी उसे उपस्थित देख लेता था। सैकड़ों रथियों के समान वह वीर सात्यकि उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम तथा समीपवर्ती दिशाओं में मानो नाच रहा हो, ऐसे विचरण कर रहा था ॥6-7॥
 
He moved about so swiftly that on seeing him in the west, I would immediately see him present in the east as well. Like hundreds of charioteers, that valiant Satyaki was moving about as if dancing in the north, south, east, west and also in the neighboring directions. ॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)