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श्लोक 7.140.15  |
पुन: स बाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै-
राकर्णपूर्णैर्निशितै: सपुङ्खै:।
विव्याध देहावरणं विदार्य
ते सात्यकेराविविशु: शरीरम्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| तब अलम्बुष ने अपना धनुष कान तक खींचकर अग्नि के समान प्रज्वलित और सुन्दर पंखवाले तीन तीखे बाणों द्वारा सात्यकि पर पुनः आक्रमण किया। वे बाण सात्यकि के कवच को छेदकर उसके शरीर में घुस गए॥15॥ |
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| Then Alambusha drew his bow till the ear and again attacked Satyaki with three sharp arrows, blazing like fire and having beautiful feathers. Those arrows pierced Satyaki's armour and entered his body.॥15॥ |
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