श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 14: द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता  »  श्लोक 66-67
 
 
श्लोक  7.14.66-67 
स दर्शयित्वा सैन्यानां स्वबाहुबलमात्मन:।
तमुद्यम्य महाखड्गं चर्म चाथ पुनर्बली॥ ६६॥
वृद्धक्षत्रस्य दायादं पितुरत्यन्तवैरिणम्।
ससाराभिमुख: शूर: शार्दूल इव कुञ्जरम्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
वीर एवं शक्तिशाली अभिमन्यु ने अपने सैनिकों को अपनी भुजाओं का बल दिखाकर पुनः अपनी विशाल तलवार और ढाल हाथों में ली और अपने पिता के परम शत्रु वृद्धक्षत्र के पुत्र जयद्रथ की ओर उसी प्रकार बढ़ा, जैसे सिंह हाथी पर आक्रमण करता है।
 
The valiant and powerful Abhimanyu, having displayed his arm strength to his soldiers, once again took up his huge sword and shield in his hands and advanced towards Jayadratha, the son of Vriddhakshatra, who was his father's greatest enemy, in the same manner as a lion attacks an elephant.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas