श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 14: द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  7.14.58 
भ्रामितं पुनरुद्‍भ्रान्तमाधूतं पुनरुत्थितम्।
चर्मनिस्त्रिंशयो राजन् निर्विशेषमदृश्यत॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
राजा ! उस समय नीचे की ओर झूलना, ऊपर की ओर झूलना, इधर-उधर घूमना और फिर ऊपर उठना - ये क्रियाएँ इतनी तेजी से हो रही थीं कि ढाल और तलवार में कोई अंतर नहीं दिखाई देता था ॥58॥
 
King! At that time the actions of swinging downwards, swinging upwards, rotating from side to side and then raising up again were happening so fast that no difference could be seen between the shield and the sword. ॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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