| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 14: द्रोणका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका द्वन्द्वयुद्ध, रणनदीका वर्णन तथा अभिमन्युकी वीरता » श्लोक 1 |
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| | | | श्लोक 7.14.1  | संजय उवाच
तत: स पाण्डवानीके जनयन् सुमहद् भयम्।
व्यचरत् पृतनां द्रोणो दहन् कक्षमिवानल:॥ १॥ | | | | | | अनुवाद | | संजय ने कहा, 'हे राजन! जिस प्रकार अग्नि घास-फूस के ढेर को जला देती है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य पाण्डव सेना में महान भय उत्पन्न करते हुए तथा सम्पूर्ण सेना को जलाकर राख करते हुए सभी दिशाओं में घूमने लगे। | | | | Sanjaya said, 'O King! Just as a fire burns a heap of grass and straw, in the same way Dronacharya started roaming in all directions, creating great fear in the Pandava army and burning the entire army. | | ✨ ai-generated | | |
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