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mahabharat 7.139.98: वृकोदर! युद्ध और संन्यासी जीवन में क्या अंतर है? जाओ, जाओ, वन में जाओ। पिताश्री! तुममें युद्ध करने की क्षमता नहीं है। तुम्हें तो केवल वनवास ही प्रिय है॥ 98॥   |   mahabharat अध्याय 7.139: भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 139: भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध, पहले भीमकी और पीछे कर्णकी विजय, उसके बाद अर्जुनके बाणोंसे व्यथित होकर कर्ण और अश्वत्थामाका पलायन  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  7.139.98 
क्व युद्धं क्व मुनित्वं च वनं गच्छ वृकोदर।
न त्वं युद्धोचितस्तात वनवासरतिर्भवान्॥ ९८॥
 
 
अनुवाद
वृकोदर! युद्ध और संन्यासी जीवन में क्या अंतर है? जाओ, जाओ, वन में जाओ। पिताश्री! तुममें युद्ध करने की क्षमता नहीं है। तुम्हें तो केवल वनवास ही प्रिय है॥ 98॥
 
Vrikodara! Where is the difference between war and the life of a hermit? Go, go, go to the forest. Father! You do not have the ability to fight a war. You are only fond of exile.॥ 98॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)