श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 137: भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा दुर्योधनके सात भाइयोंका वध  »  श्लोक 43-46h
 
 
श्लोक  7.137.43-46h 
यद् द्यूतकाले दुर्बुद्धिरब्रवीत् तनयस्तव।
सभामानाय्य पाञ्चालीं कर्णेन सहितोऽल्पधी:॥ ४३॥
यच्च कर्णोऽब्र्रवीत् कृष्णां सभायां परुषं वच:।
प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां तव चैव विशाम्पते॥ ४४॥
शृण्वतस्तव राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वश:।
विनष्टा: पाण्डवा: कृष्णे शाश्वतं नरकं गता:॥ ४५॥
पतिमन्यं वृणीष्वेति तस्येदं फलमागतम्।
 
 
अनुवाद
आपके मन्दबुद्धि पुत्र दुर्योधन ने द्यूतक्रीड़ा के समय पांचाल की राजकुमारी द्रौपदी को सभा में बुलाकर उसके विषय में बुरा-भला कहा था। और हे प्रजानाथ! महाराज! आपके सामने ही पाण्डवों तथा समस्त कौरवों के सामने कर्ण ने द्रौपदी से कठोर वचन कहे थे कि 'कृष्ण! पाण्डवों का नाश हो गया। वे सदा के लिए नरक में चले गए। तुम्हें दूसरा पति ले लेना चाहिए।' आज हमें उस अन्याय का फल मिला है। ॥43-45 1/2॥
 
During the game of dice, your slow-witted son Duryodhan had called the princess of Panchala, Draupadi, to the court and had spoken ill of her. And in front of you, O Prajanath! Maharaj! In front of the Pandavas and all the Kauravas, Karna had spoken harsh words to Draupadi that 'Krishna! The Pandavas are destroyed. They have gone to hell forever. You should take another husband'. Today, we have received the result of that injustice. ॥ 43-45 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)