श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 135: धृतराष्ट्रका खेदपूर्वक भीमसेनके बलका वर्णन और अपने पुत्रोंकी निन्दा करना तथा भीमके द्वारा दुर्मर्षण आदि धृतराष्ट्रके पाँच पुत्रोंका वध  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.135.1 
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये धिक् पौरुषमनर्थकम्।
यत्राधिरथिरायत्तो नातरत् पाण्डवं रणे॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले, "संजय! मैं भाग्य को ही सबसे बड़ा मानता हूँ। प्रयत्न व्यर्थ हैं। उन्हें धिक्कार है, क्योंकि उनमें स्थित अधिरथपुत्र कर्ण, सब प्रकार से प्रयत्न करने पर भी युद्धभूमि में पाण्डवपुत्र भीम को पराजित नहीं कर सका।"
 
Dhritarashtra said, "Sanjay! I consider destiny to be the greatest. Efforts are futile. Shame on them because Karna, the son of Adhiratha, who was placed in them, could not defeat Bhima, the son of Pandava, in the battlefield despite trying in every way."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)