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mahabharat 7.133.44-45: भीमसेन के बाणों से घायल होने पर भी शत्रुओं को संताप देने वाला वह महारथी कर्ण युद्धभूमि में क्रुद्ध भीमसेन को छोड़कर भागा नहीं ॥44-45॥   |   mahabharat अध्याय 7.133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  7.133.44-45 
तथाप्यतिरथ: कर्णो भिद्यमानोऽस्य सायकै:॥ ४४॥
न जहौ समरे भीमं क्रुद्धरूपं परंतप:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन के बाणों से घायल होने पर भी शत्रुओं को संताप देने वाला वह महारथी कर्ण युद्धभूमि में क्रुद्ध भीमसेन को छोड़कर भागा नहीं ॥44-45॥
 
Even after being wounded by Bhimasena's arrows, that great warrior Karna who tormented his enemies did not abandon the enraged Bhimasena on the battlefield and run away. ॥ 44-45॥
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णभीमयुद्धे त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्ण और भीमसेनका युद्धविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)