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mahabharat 7.133.32-34h: महाराज! वे आपस में लड़ रहे थे, एक-दूसरे पर अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे, एक-दूसरे को जला रहे थे, क्रोध से एक-दूसरे को घूर रहे थे, कभी हँस रहे थे, कभी एक-दूसरे को बार-बार डाँट रहे थे और शंख बजा रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 7.133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध  »  श्लोक 32-34h
 
 
श्लोक  7.133.32-34h 
निर्दहन्तौ महाराज शस्त्रवृष्टॺा परस्परम्॥ ३२॥
अन्योन्यमभिवीक्षन्तौ कोपाद् विवृतलोचनौ।
प्रहसन्तौ तथान्योन्यं भर्त्सयन्तौ मुहुर्मुहु:॥ ३३॥
शंखशब्दं च कुर्वाणौ युयुधाते परस्परम्।
 
 
अनुवाद
महाराज! वे आपस में लड़ रहे थे, एक-दूसरे पर अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे, एक-दूसरे को जला रहे थे, क्रोध से एक-दूसरे को घूर रहे थे, कभी हँस रहे थे, कभी एक-दूसरे को बार-बार डाँट रहे थे और शंख बजा रहे थे।
 
Maharaj! They were fighting with each other, showering weapons on each other, burning each other, glaring at each other with anger, sometimes laughing and sometimes scolding each other repeatedly and blowing the conch shells.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)