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mahabharat 7.133.12: मैं भी पुत्रमोह के वशीभूत होकर अधर्मी आत्मा हूँ, और मैंने भी धर्म में सदैव दृढ़ रहने वाले महान पाण्डवों को धोखा दिया है॥12॥   |   mahabharat अध्याय 7.133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 133: भीमसेन और कर्णका युद्ध, कर्णके सारथिसहित रथका विनाश तथा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जयका वध  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.133.12 
पुत्रस्नेहाभिभूतेन मया चाप्यकृतात्मना।
धर्मे स्थिता महात्मानो निकृता: पाण्डुनन्दना:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मैं भी पुत्रमोह के वशीभूत होकर अधर्मी आत्मा हूँ, और मैंने भी धर्म में सदैव दृढ़ रहने वाले महान पाण्डवों को धोखा दिया है॥12॥
 
I too, an incompetent soul, under the influence of love for my son, cheated the great Pandavas who always remained steadfast in their dharma. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)