श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 131: भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  7.131.58 
स वैक्लव्यं महत् प्राप्य छिन्नधन्वा शराहत:।
तथा पुरुषमानी स प्रत्यपायाद् रथान्तरम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि कर्ण को अपने पुरुषत्व पर बड़ा गर्व था, फिर भी भीमसेन के बाणों से घायल होकर तथा धनुष कट जाने पर रथहीन हो जाने पर वह अत्यन्त भयभीत हो गया और वहाँ से भागकर दूसरे रथ पर बैठ गया।
 
Although Karna was very proud of his masculinity, yet being wounded by Bhimasena's arrows and being without a chariot after his bow was cut, he became very frightened and ran away from there to sit on another chariot.
 
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णपराजये एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्णकी पराजयविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३१॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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