श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 131: भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  7.131.1-2 
संजय उवाच
वर्तमाने महाराज संग्रामे लोमहर्षणे।
व्याकुलेषु च सर्वेषु पीडॺमानेषु सर्वश:॥ १॥
राधेयो भीममानर्च्छद् युद्धाय भरतर्षभ।
यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमभिद्रवन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - हे भरतश्रेष्ठ राजा! जब यह रोमांचकारी युद्ध आरम्भ हुआ और सारी सेनाएँ सब ओर से व्याकुल और व्यथित हो उठीं, तब राधापुत्र कर्ण पुनः युद्ध के लिए भीमसेन के सामने आया। जैसे वन में मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी पर आक्रमण करता है॥1-2॥
 
Sanjaya says - O best king of Bharata! When this thrilling battle started and all the armies were troubled and distressed from all sides, then Radha's son Karna again came in front of Bhimasena for the battle. Just like in the forest, a drunken elephant attacks another drunken elephant.॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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