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श्लोक 7.128.56  |
एवं बहुविधं तस्य राज्ञश्चिन्तयतस्तदा।
कृपयाभिपरीतस्य घोरं युद्धमवर्तत॥ ५६॥ |
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| अनुवाद |
| जब राजा युधिष्ठिर इस प्रकार दया से द्रवित होकर अनेक प्रकार की बातें सोच रहे थे, तब दूसरी ओर भयंकर युद्ध चल रहा था। |
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| While King Yudhishthira was thus moved with pity and thinking of various things, a fierce battle was going on on the other side. |
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इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमसेनप्रवेशे युधिष्ठिरहर्षे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश तथा युधिष्ठिरका हर्षविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥
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