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श्लोक 7.128.49-51h  |
पुत्रशोकाभिसंतप्तश्चिकीर्षन् कर्म दुष्करम्।
जयद्रथवधान्वेषी प्रतिज्ञां कृतवान् हि य:॥ ४९॥
कच्चित् स सैन्धवं संख्ये हनिष्यति धनंजय:।
कच्चित् तीर्णप्रतिज्ञं हि वासुदेवेन रक्षितम्॥ ५०॥
अनस्तमित आदित्ये समेष्याम्यहमर्जुनम्। |
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| अनुवाद |
| जो अर्जुन अपने पुत्र के वियोग से दुःखी होकर कठिन कार्य करने की इच्छा से जयद्रथ को मारने की घोर प्रतिज्ञा कर चुका है, क्या वह आज युद्ध में सिंधुराज को मार सकेगा? जो अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके सूर्यास्त के पूर्व लौट आया है और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित है, क्या मैं उस अर्जुन से मिल सकूँगा?॥ 49-50 1/2॥ |
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| Will Arjuna, who, grieved by the grief of losing his son and desired to perform a difficult task and made a heavy vow to kill Jayadratha, kill the King of Sindhus in the battle today? Will I be able to meet Arjuna, who has returned before the sunset having fulfilled his vow and is protected by Lord Krishna?॥ 49-50 1/2॥ |
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