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mahabharat 7.128.44: जिन निवातकवच नामक दैत्यों को, जिन्हें देवताओं के लिए भी हराना अत्यन्त कठिन था, एक ही धनुष के बल से परास्त करने वाले कुन्तीपुत्र अर्जुन हमारे सौभाग्य से जीवित हैं ॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 7.128: भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 128: भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.128.44 
निवातकवचा येन देवैरपि सुदुर्जया:।
निर्जिता धुनुषैकेन दिष्टॺा पार्थ: स जीवति॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जिन निवातकवच नामक दैत्यों को, जिन्हें देवताओं के लिए भी हराना अत्यन्त कठिन था, एक ही धनुष के बल से परास्त करने वाले कुन्तीपुत्र अर्जुन हमारे सौभाग्य से जीवित हैं ॥ 44॥
 
The son of Kunti, Arjuna, who had defeated the demons named Nivatakavacha, who were extremely difficult to defeat even for the gods, with the help of a single bow, is alive due to our good fortune. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)