| श्री महाभारत » पर्व 7: द्रोण पर्व » अध्याय 128: भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना » श्लोक 14-16 |
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| | | | श्लोक 7.128.14-16  | यदा तु विशिखैस्तीक्ष्णैर्द्रोणचापविनि:सृतै:।
वध्यन्ते समरे वीरा: शतशोऽथ सहस्रश:॥ १४॥
ततो रथादवप्लुत्य वेगमास्थाय पाण्डव:।
निमील्य नयने राजन् पदातिर्द्रोणमभ्ययात्॥ १५॥
अंसे शिरो भीमसेन: करौ कृत्वोरसि स्थिरौ।
वेगमास्थाय बलवान् मनोऽनिलगरुत्मताम्॥ १६॥ | | | | | | अनुवाद | | महाराज! जब द्रोणाचार्य के धनुष से छूटे हुए तीखे बाणों से रणभूमि में सैकड़ों-हजारों योद्धा मारे जाने लगे, तब बलवान पाण्डवपुत्र भीम बड़े वेग से रथ से कूद पड़े, आँखें बंद कर लीं, सिर कंधों पर टिका लिया और दोनों हाथ छाती पर दृढ़तापूर्वक रखकर मन, वायु और गरुड़ के समान वेग का भरोसा करके पैदल ही द्रोणाचार्य की ओर दौड़े। | | | | King! When hundreds and thousands of warriors started getting killed in the battlefield by the sharp arrows shot from Dronacharya's bow, then the powerful Pandava son Bhima jumped from the chariot with great force, closed his eyes, lowered his head on the shoulders, and keeping both his hands firmly on his chest, ran towards Dronacharya on foot, relying on his mind, wind and the speed of an eagle. | | ✨ ai-generated | | |
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