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mahabharat 7.127.6-7: किन्तु जब कुंतीपुत्र महाराज ने मुझे वहाँ जाने की अनुमति दे दी है, तब मैं उन्हें कोरा उत्तर नहीं दे सकता - मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। अतः मैं उस स्थान पर जाऊँगा जहाँ मरणासन्न जयद्रथ खड़ा है। मुझे धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन करना ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। ॥6-7॥   |   mahabharat अध्याय 7.127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  7.127.6-7 
एवमुक्तोऽस्मि पार्थेन प्रतिवक्तुं न चोत्सहे॥ ६॥
प्रयास्ये तत्र यत्रासौ मुमूर्षु: सैन्धव: स्थित:।
धर्मराजस्य वचने स्थातव्यमविशङ्कया॥ ७॥
 
 
अनुवाद
किन्तु जब कुंतीपुत्र महाराज ने मुझे वहाँ जाने की अनुमति दे दी है, तब मैं उन्हें कोरा उत्तर नहीं दे सकता - मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। अतः मैं उस स्थान पर जाऊँगा जहाँ मरणासन्न जयद्रथ खड़ा है। मुझे धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा का पालन करना ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। ॥6-7॥
 
‘But when Kunti's son Maharaja has given me permission to go there, then I cannot give him a blank reply - I cannot disobey his order. Therefore, I will go to the place where the dying Jayadratha is standing. I must remain under the orders of Dharmaraja Yudhishthira without any doubt. ॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)