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mahabharat 7.127.47: अपने गुरु के ये वचन सुनकर भीमसेन की आंखें क्रोध से लाल हो गईं और वे बड़े अधीरता और निर्भयता से द्रोणाचार्य से बोले।   |   mahabharat अध्याय 7.127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन   ।   mahabharat पर्व 7: द्रोण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.127.47 
अथ भीमस्तु तच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यमपेतभी:।
क्रुद्ध: प्रोवाच वै द्रोणं रक्तताम्रेक्षणस्त्वरन्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
अपने गुरु के ये वचन सुनकर भीमसेन की आंखें क्रोध से लाल हो गईं और वे बड़े अधीरता और निर्भयता से द्रोणाचार्य से बोले।
 
Hearing these words of his Guru, Bhimasena's eyes became red with anger and he spoke to Dronacharya very impatiently and fearlessly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)