श्री महाभारत  »  पर्व 7: द्रोण पर्व  »  अध्याय 127: भीमसेनका कौरव-सेनामें प्रवेश, द्रोणाचार्यके सारथिसहित रथका चूर्ण कर देना तथा उनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वध, अवशिष्ट पुत्रोंसहित सेनाका पलायन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.127.31 
आरुजन् विरुजन् पार्थो ज्यां विकर्षंश्च पाणिना।
सम्प्रकर्षन् विमर्षंश्च सेनाग्रं समलोडयत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
कुंतीपुत्र भीम अपने हाथों से धनुष की डोरी खींचते, उसे कान तक कसते, बाणों की वर्षा करते, शत्रुओं को घायल करते, उनके अंग तोड़ते और फिर सेना के अग्रभाग को कुचल देते।
 
Bhima, the son of Kunti, would pull the bowstring with his own hands, pull it tight till the ear, shower arrows and wound the enemies, breaking their limbs and then crush the front of the army.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)